कानून

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम1995 के नियम11 के अन्तर्गत अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति, उसके आश्रित तथा साक्षियों को यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, भरण-पोषण व्यय और परिवहन सुविधाएं देय हैं-

  1. अत्याचार से पीडि़त प्रत्येक व्यक्ति, उसके आश्रित और साक्षियों को उसके आवास अथवा ठहरने के स्थान से अधिनियम के अधीन अपराध के अन्वेषण या सुनवाई या विचारण के स्थान तक का एक्सप्रेस/मेल/यात्री ट्रेन में द्वितीय श्रेणी का आने-जाने का रेल भाड़ा अथवा वास्तविक बस व टैक्सी भाड़े का संदाय किया जाएगा।

  2. जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कोई अन्य कार्यपालक मजिस्टेªट, अत्याचार से पीडि़त व्यक्तियों और साक्षियों को, अन्वेषण अधिकारी, पुलिस अधीक्षक/ पुलिस उप अधीक्षक, जिला मजिस्टेªट या किसी अन्य कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के पास जाने के लिए परिवहन सुविधाएं देने अथवा उसके पूरे संदाय की प्रतिपूर्ति की आवश्यक व्यवस्था करेंगे।

  3. प्रत्येक महिला साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति या उसकी आश्रित महिला या अव्यस्क व्यक्ति, साठ वर्ष की आयु से अधिक का व्यक्ति और 40 प्रतिशत या उससे अधिक का निःशक्त व्यक्ति अपनी पसंद का परिचर अपने साथ लाने का हकदार होगा। परिचर को भी इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध की सुनवाई, अन्वेषण और विचारण के दौरान बुलाए जाने पर साक्षी अथवा अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति को देय यात्रा और भरण-पोषण व्यय का संदाय किया जाएगा।

  4. साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति या उसका/उसकी आश्रित तथा परिवार को अपराध के अन्वेषण, सुनवाई और विचारण के दौरान उसके आवास अथवा ठहरने के स्थान से दूर रहने के दिनों के लिए ऐसी दरों पर दैनिक भरण-पोषण व्यय का संदाय किया जाएगा जो उस न्यूनत्तम मजदूरी से जैसा कि राज्य सरकार के कृषि श्रमिकों के लिए नियत की हो, कम नहीं होगा।

  5. साक्षी, अत्याचार से पीडि़त व्यक्ति(अथवा उसका/उसकी आश्रित) और परिचर को दैनिक भरण-पोषण व्यय के अतिरिक्त आहार व्यय का भी ऐसी दरों पर संदाय किया आएगा जैसा कि राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर नियत करंे।

  6. पीडि़त व्यक्तियों, उनके आश्रितों/परिचर तथा साक्षियों को अन्वेषण अधिकारी या पुलिस थाना के भारसाधक अथवा अस्पताल प्राधिकारियों या पुलिस अधीक्षक/उप पुलिस अधीक्षक अथवा जिला मजिस्ट्रेट या किसी अन्य संबंधित अधिकारी के पास अथवा विशेष न्यायालय जाने के दिनों के लिए यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, भरण पोषण व्यय तथा परिवहन सुविधाओं की प्रतिपूर्ति जिला मजिस्ट्रेट अथवा उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा तुरंत अथवा अधिक से अधिक तीन दिनों में किया जाएगा।

  7. जब अधिनियम की धारा 3 के अधीन कोई अपराध किया गया है तो जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा कोई अन्य कार्यपालिका मजिस्ट्रेट, अत्याचार से पीडि़त व्यक्तियों के लिए औषधियों, विशेष परामर्श, रक्तदान, बदलने के लिए आवश्यकक वस्त्र, भोजन और फलों के लिए संदाय की प्रतिपूर्ति करेंगे।


नागरिकों के मूल अधिकार

भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसमें प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 14 से 32 तक में इन मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार नागरिकों के मुख्य-मुख्य मूल अधिकार निम्नलिखित हैः-

  1. समता का अधिकार

    संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत नागरिकों को समता का मूल अधिकार प्रदान किया गया है। इसके अनुसार-

    क- किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता एवं

    ख- विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जायेगा।

  2. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

    संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य द्वारा किसी नागरिक के विरूद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद नहीं किया जायेगा। इन आधारों पर किसी भी व्यक्ति को दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों, सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों, तालाबों, कुओं, स्नानघाटांे, सड़कों आदि के उपयोग से वंचित नहीं किया जायेगा।

  3. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

    अनुच्छेद 16 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य के अधीन किसी पद या नियोजन या नियुक्ति के संबध में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समता होगी अर्थात् किसी भी व्यक्ति के साथ नियोजन अर्थात् रोजगार के मामलों में मात्र धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

  4. छुआछूत का अन्त

    अनुच्छेद 17 के द्वारा अस्पृश्यता अर्थात् छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। किसी भी व्यक्ति से बरती छुआछूत नहीं बरती जाएगी और छुआछूत करने वाले व्यक्ति को विधि के अनुसार दंडित किया जा सकेगा।

  5. उपाधियों का अन्त

    अनुच्छेद 18 के अन्तर्गत सेना अथवा विद्या संबंधी सम्मान अर्थात् उपाधियों को छोड़कर शेष सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।

  6. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (क) के अन्तर्गत नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है अर्थात् प्रत्येक नागरिक को अपने विचार अभिव्यक्त करने एवं विचारों का आदान प्रदान करने की स्वतंत्रता होगी। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता एवं सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।

  7. सम्मेलन करने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (ख) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को शान्तिपूर्वक एवं अस्त्र-शस्त्र रहित सम्मेलन आदि करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

  8. संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (ग) के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को संघ अथवा संगठन बनाने, उन्हें चालू रखने अथवा समाप्त करने आदि की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

  9. भारत में भ्रमण आदि करने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (घ) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र में सर्वत्र विचरण अर्थात् भ्रमण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसमें एक राज्य दूसरे राज्य में तथा एक ही राज्य में एक स्थान से दूसरे स्थान में विचरण करने की स्वतंत्रता सम्मिलित है।

  10. निवास करने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (ड़) में भारत के नागरिक का भारत के किसी भी राज्य क्षेत्र मंे निवास करने एवं बस जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

  11. व्यापार अथवा कारोबार करने की स्वतंत्रता

    अनुच्छेद 19 (1) (छ) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को अपनी रूचि का व्यापार, व्यवसाय, वृत्ति अथवा कारोबार आदि करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। यहीं यह भी उल्लेखनीय है कि ये स्वतंत्रताएं निरपेक्ष अर्थात् अबाध नहीं है। इन स्वतंत्रताओं पर देश की एकता एवं अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, सदाचार, मानहानि, अपराध उद्दीपन अथवा न्यायालय अवमान आदि आधारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

  12. दोषसिद्धि के संबंध मंे संरक्षण

    अनुच्छेद 20 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि-

    क- किसी भी व्यक्ति को ऐसे किसी कृत्य के लिए दण्डित किया जा सकेगा, जो तत्समय किसी विधि के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध न हो,

    ख- किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिये एक से अधिक बार अभियोजित एवं दण्डित नहीं किया जाएगा एवं

  13. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता अर्थात् जीवन जीने का अधिकार

    संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को दिया गया यह एक महत्वपूर्ण मूल अधिकार है। इसके अनुसार, किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जायेगा। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार है।

    हमारे उच्चत्तम न्यायालय ने खड़कसिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (एआईआर 1963 सु. को. 1995) के मामले में यह कहा है कि- जीवन जीने के अधिकार से अभिप्राय सम्मानजनक एवं मानव गरिमायुक्त जीवन जीने से है। इस अधिकार में समय-समय पर हमारी न्यायपालिका द्वारा भी कई अधिकारों को जोड़ा गया है, जैसे-

    क- एकान्तता का अधिकार

    ख- आवास का अधिकार

    ग- पर्यावरण संरक्षण का अधिकार

    घ- शीघ्र न्याया पाने का अधिकार

    ड़- निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार

    च- चिकित्सा का अधिकार

    छ- शिक्षा का अधिकार आदि।

  14. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार

    संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिये निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

  15. गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को निम्नांकित संरक्षण प्रदान किये गये हैं-

    क- उसे गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराया जायेगा।

    ख- उसे किसी अधिवक्ता से परामर्श करने का अवसर प्रदान किया जायेगा तथा

    ग- उसे गिरफ्तार किये जाने के पश्चात् 24 घंटे के भीतर निकटत्तम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा।

  16. शोषण के विरूद्ध अधिकार

    अनुच्छेद 23 एवं 24 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया है कि-

    क- किसी भी व्यक्ति से बेगार नहीं ली जाएगी,

    ख- उससे बलात् श्रम नहीं लिया जाएगा एवं

    ग- 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों आदि में नियोजित नहीं किया जाएगा।

  17. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

    संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने अन्तःकरण के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार-प्रसार करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

    दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि हमारे संविधान में किसी भी व्यक्ति पर किसी धर्म विशेष को नहीं थोपा गया है। सिक्खों को कृपाण लेकर चलने की स्वतंत्रता है।

  18. अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण

    संविधान के अनुच्छेद 29 के अन्तर्गत भारत में निवासी नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार प्रदान किया गया है।

  19. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

    अनुच्छेद 32 एवं 226 के अन्तर्गत नागरिकों का संवैधानिक उपचारों का एक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किया गया है। इस अधिकार के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिये उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है। ऐसी याचिकाएं निम्नांकित हो सकती हैं-

    क- बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका

    ख- परमादेश याचिका

    ग- प्रतिषेध याचिका

    घ- अधिकारपृच्छा याचिका एवं

    ड़- उत्प्रेषण याचिका।

    संविधान निर्माता डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 के संविधान का एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद एवं उसकी आत्मा बताया है।

बालकों के कानूनी अधिकार

बालक देश का भविष्य है। वही देश का भाग्य निर्माता है। देश का समग्र विकास बालकों पर निर्भर है। ऐसा कहा जाता है कि जैसा आज का बालक होगा वैसा ही कल का भारत होगा। अतः बालकों का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सुदृढ़ एवं सुसंस्कारित होना आवश्यक है। यही कारण है कि बालकों के सर्वांगीण विकास के लिये भारत के संविधान और कानूनों में उन्हें कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए गए हैं और उनके हितों को संरक्षण प्रदान किया गया है। यहाँ कुछ कानूनी अधिकारों का उल्लेख किया जा रहा है।

  1. जीवन जीने का अधिकारः

    हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को, जिसमें बालक भी सम्मिलित है, जीवन जीने का अधिकार प्रदान किया गया है। इतना ही नहीं उसे सम्मानजनक एवं मानव गरिमा युक्त जीवन जीने का अधिकार है। बालक को इस अधिकार से अवैध रूप से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य का यह कत्र्तव्य है कि वह बालक की बुनियादी आवश्यकताओें को पूरा करें।

  2. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकारः

    छः वर्ष से चैदह वर्ष के प्रत्येक बालक को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा में प्रत्येक बालक को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करने की राज्य द्वारा गारन्टी दी गई है। अभिभावकों का भी यह कर्तव्य है कि वे अपने बालकों को शिक्षा के लिये विद्यालय में प्रवेश कराएंगे।

  3. दण्ड से मुक्ति का अधिकारः

    छोटे बालकों अर्थात् शिशुआंे को आपराधिक मामलों में दण्डित नहीं किया जा सकता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा82 में यह कहा गया है कि सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य अपराध नहीं है और उसे ऐसे कार्य के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता है। 7 से 12 वर्ष तक की आयु के बालक अथवा शिशु केवल तभी दण्डित किया जा सकता है जब उसे अपने द्वारा किये गये कार्य प्रकृति का ज्ञान रहा हो।

  4. शोषण के विरूद्ध अधिकारः

    संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 में यह कहा गया है कि किसी भी बालक का न तो शोषण किया जायेगा और न ही उससे बेगार ली जा सकती है। उनका अनैतिक व्यापार अर्थात् यौन-शोषण भी नहीं किया जा सकता। अब बालकों को बन्धुआ मजदूर भी नहीं बनाया जा सकता है।

  5. कारखानों में नियोजन से सुरक्षाः

    कारखाना अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 24 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों,खानों व अन्य जोखिम भरे कार्यों में नियोजित नहीं किया जायेगा। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह हुआ कि बालकों से कठोर श्रम नहीं लिया जाए ताकि उनका शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास हो सके।

  6. भरण-पोषण का अधिकारः

    प्रत्येक बालक को अपने माता-पिता से भरण-पोषण का अधिकार उपलब्ध है। दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में यह कहा गया है कि प्रत्येक माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वह अपने बालकों का भरण-पोषण करें। जब तक बालक आजीविका कमाने योग्य नहीं हो जाता तब तक माता-पिता उसकी परवरिश करने के लिये उत्तरदायी हैं। यदि कोई बालक विकलांग है, मंद बुद्धि है, अथवा बालिका अविवाहिता है, तब भी माता-पिता का दायित्व है कि उसका भरण-पोषण करे।

  7. बालक के कल्याण को सर्वोपरि माने जाने का अधिकारः

    हिन्दू विधि एवं अन्य सभी विधियों में इस बात की व्यवस्था की गई है कि जब भी बालक को किसी व्यक्ति की अभिरक्षा में दिया जाना हो तब उसके कल्याण को सर्वोपरि महत्व दिया जायेगा अर्थात् जहाँ बालक का कल्याण सुरक्षित हो वहीं बालक को अभिरक्षा में सौपा जायेगा। यह आवश्यक नहीं है कि बालक को केवल पिता की अभिरक्षा में ही सौंपा जाये। यदि माता अथवा कोई नातेदार उसकी अच्छी परवरिश कर सकता है तो उसे उनकी अभिरक्षा में दिया जा सकता है।

  8. बाल विवाह से बचने का अधिकारः

    बाल विवाह निषेध कानून, 2006 बाल विवाह पर रोक लगाता है। जब तक बालक की आयु 21 वर्ष और बालिका की आयु 18 वर्ष नहीं हो जाती तब तक उसका विवाह नहीं किया जा सकता है। यह कानून इसलिए बनाया गया है ताकि बालकों का सर्वांगीण विकास हो सके।

  9. किशोर न्याय का अधिकारः

    कई बार बालक अपराध कर बैठते हैं, लेकिन बालकों को अपराधी नहीं कहा जाता है। बालकों के लिये एक विशेष कानून किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 बनाया गया है। इस अध्निियम के अन्तर्गत बालकों को अपराधी नहीं कह कर अपचारी बालक अथवा विधि विरूद्ध किशोर की संज्ञा दी गई है। सामान्यतः ऐसे बालकों को कारावास का दण्ड नहीं दिया जाता है और उन्हें सुधार गृहों में भेज दिया जाता है। ऐसे बालकों को न हथकड़ी लगाई जाती है और न जेल में बंद रखा जाता है। बालकों में ऐसे व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया है जिनकी आयु 18 वर्ष से कम है।

  10. सम्पत्ति का अधिकारः

    हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अन्तर्गत प्रत्येक बालक को अपनी पैतृक सम्पत्ति में जन्मतः अधिकार प्रदान किया गया है। वह पैतृक सम्पत्ति में विधिनुसार हिस्सा पाने का हकदार है। वह भरण-पोषण, शिक्षा-दीक्षा आदि के खर्चे पाने का हकदार है।

  11. रैगिंग से सुरक्षा का अधिकारः

    इन दिनों विद्यालयों और महाविद्यालयों में रैगिंग का प्रचलन बढ़ रहा है। रैगिंग से अभिप्राय विद्यालयों में प्रवेश के समय कुछ पुराने विद्यार्थियों द्वारा नये विद्यार्थियों को शारीरिक एवं मानसिक यातना देने से है। कई बार यह सुनने में आता है कि प्रवेश के समय नये विद्यार्थियों को मुर्गा बनाया जाता है तथा उनके साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। इससे परेशान होकर अनेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और कभी-कभी आत्म हत्या भी कर लेते हैैैं। अतः सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों द्वारा रैगिंग पर रोक लगा दी गई है और इसके लिये दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।

  12. दत्तक का अधिकारः

    बालक को दत्तक में लेने की प्रथा विद्यमान है। कोई भी निःसंतान व्यक्ति ऐसे बालक को दत्तक ले सकता है जो हिन्दू है, जो पहले से दत्तक में नहीं गया है, जिसने 15 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है और जो अविवाहित है, लेकिन जहाँ प्रथा हो वहाँ 15 वर्ष से कम आयु के बालक को और विवाहित व्यक्ति को भी दत्तक में लिया जा सकता है। जब कोई बालक दत्तक ले लिया जाता है तब उसे दत्तक परिवार में सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् उसे वे सभी अधिकार मिल जाते हैं जो एक प्राकृतिक पुत्र या पुत्री को मिले होते हैं।

  13. संवैधानिक संरक्षणः

    हमारे संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। जाति, धर्म, वर्ग, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कियाजा सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 15 में बालकों के लिये एक विशेष व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 15 में यह कहा गया है कि राज्य बालकों के कल्याण के लिये एक विशेष कानून बना सकेगा।

शिक्षा का अधिकार

संविधान के 86 वें संशोधन अधिनियम द्वारा वर्ष 2002 में संविधान में अनुच्छेद 21 जोड़कर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मूल अधिकार दिया गया है। तत्पश्चात ही बालकों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने के उदेश्य से निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा ‘‘बालकों का अधिकार अधिनियम 2009’’ भारतीय संसद ने पारित किया जिसे 1 अप्रेल 2010 से लागू कर दिया गया है।

  1. प्रत्येक बच्चे को जिसकी उम्र 6 से 14 वर्ष है पड़ोस के स्कूल में निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।

  2. राज्य सरकार एवं स्थानीय प्राधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे समुचित मात्रा में स्कूल खोलें।

  3. किसी भी बच्चे से केपिटेशन फीस वसूल नहीं की जा सकती न ही उसका कोई सक्रीनिंग टेस्ट लिया जा सकता है। इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर स्कूलों पर जुर्माना अधिरोपित किया जा सकेगा। स्कूलों द्वारा बच्चों को एडमिशन से इंकार नहीं किया जा सकता है।

  4. किसी भी बच्चे को शारीरिक या मानसिक दण्ड नहीं दिया जा सकता है।

  5. उक्त प्रावधान सभी स्कूलों पर लागू होते हैं, चाहे वे सरकारी हो या सरकार से अनुदान प्राप्त करते हों या प्राईवेट हो।

  6. सरकारी या सरकार से अनुदान प्राप्त स्कूलों में स्कूल मैनेजमेन्ट कमेटी बनाई जायेगी जिसके तीन चैथाई सदस्य बच्चों के माता-पिता होंगे तथा कमिटी में 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ होंगी।

  7. उक्त कमिटी स्कूल विकास के लिए योजना तैयार करेगी।

  8. शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जा सकेगा और ना ही वे प्राईवेट ट्यूशन कर सकते है।

  9. बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाया जायेगा। सभी राज्यों में आयोग बनेंगे।

  10. उक्त अधिनियम के तहत अधिकारों की सुरक्षा के लिए नगर पालिका, नगर परिषद्, जिला-परिषद् में प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है।

  11. सभी माता-पिताओं का यह दायित्व होगा कि वे बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल में दाखिल करवाएँ।

  12. प्राइवेट स्कूलों को भी 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी होगी।

  13. प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने से पूर्व किसी भी बच्चे को स्कूल से निकाला नही जा सकेगा।

  14. राज्य सरकार को राज्य स्तर पर स्टेट एटवाईजरी कमेटी बनानी होगी।

  15. केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय एडवाईजरी कमेटी बनेगी, जिनका कार्य केन्द्रीय सरकार को शिक्षा के विषय में सलाह देना होगा।

  16. केन्द्रीय सरकार ने उक्त अधिनियम को लागू करने के उद्देश्य से नियम भी बना दिए है।

सूचना का अधिकार यानि की जनता का अधिकार

सूचना का अधिकार जन साधाराण को दिया गया एक अमूल्य उपहार है। इस अधिनियम को 12 अक्टूबर 2005 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर शेष समस्त भारत क्षेत्र लागू कर दिया गया है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य शासन प्रशासन के कार्य में पारदर्शिता लाना तथा उत्तरदायित्व स्थापित करना है। इस विधि का विस्तार 6 अध्यायों के अन्तर्गत 31 धाराओं, उनकी उपराधाओं तथा दो अनुसूचियों में है।

सूचना की परिभाषा - सूचना का आशय किसी भी तरह की ऐसी सामग्री से है जिससे रिकार्ड, दस्तावेज, ई-मेल, मत, प्रेस, विज्ञप्तियाँ, सर्कुलर, आदेश, लाॅग बुग, रिपोर्ट, पेपर, सैम्पल, माॅडल, इलेक्ट्रोनिक डाटा आदि शामिल हैं और जो किसी भी निजी संस्था से इस प्रकार सम्बन्धित हो कि किसी कानून के जरिए किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच संभव हो सकती हो।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत

आप पंचायत से लेकर राष्ट्रपति महोदय के दफ्तर तक सभी सरकारी कार्यालयों/गैर सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थाओं से सूचना ले सकते है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन के हर दफ्तर में सूचना देने पर लोक सूचना अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। हर लोक सूचना अधिकारी आपको सूचना देने के लिए बाध्य है।

अब आप -

- किसी भी सरकारी फाइल या दस्तावेज का निरीक्षण कर सकते है।
- किसी भी लोक निर्माण कार्य का निरीक्षण कर सकते है।
- किसी भी दस्तावेज की प्रमाणित काॅपी या उद्वरण ले सकते है।
- किसी भी सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकते है।
- इलेक्ट्रोनिक माध्यम में उपलब्ध जानकारी की प्रति ले सकते है।
- उपर बतायी गयी जानकारी के अलावा अन्य प्रकार की सूचनायें भी लोक सूचना अधिकारी से प्राप्त की जा सकती है। जैसे कोई भी अभिलेख, ज्ञापन, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति आदेश, लाॅगबुक, काॅन्ट्रेक्ट रिपोर्ट, नमूने, आंकड़े, माॅडल आदि।

मेघवंशी - मेघवाल समाज

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